Romance & Longing
नैना चार हो गइल
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
जब से अँखिया मिलल नैना चार हो गइल। धीरे-धीरे सजनवां से प्यार हो गइल ।।
उनसे भइल मन के अँखिया से बतिया। जाने कवनी भाषा लिखावेला पतिया ।।
मन भरल ना बतिया हजार हो गइल ।।.......
पहिले तऽ व्याकुल भइल मोर मनवां। सोना हो गइलऽ रतिया के सपनवां ।।
नीद टूटल तऽ भोर भिनसार हो गइल ।।......
रहे अँखिया हमार, उनके सपना रहे। नाम आठो पहर जेकर जपना रहे ।।
रहे अनजान जे ऊ हमार हो गइल ।।.......
देखे बिना जेके रहे मन अधीर। दिन-दिन सूखेला हमरो शरीर ।।
मिलते गदगद जियरा हमार हो गइल ।।...
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