Village Life
बरखा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
भीगि गइल अँगिया, भीगल मोरि सारी। बरसा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी ।।
सिहरि उठे मनवां जब बहेले पुरुवाई। भीगेला बदन मनवा लेला अंगड़ाई ।।
आइल बदरिया सनेस लिहले कारी, बरखा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी ।।........
छा गइल खेतवा चारु ओर हरियाली। बगिया में फूल खिलल बिहसि उठे माली ।।
गोरिया के अखिया काजर बिनु कारी, बरखा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी ।।..........
धरती पिआसि मिटल छक्कलितलैया। गीति गावे अंगना में फुदुके चिरइया ।।
बहि चलि नदिया कलकल करि सारी, बरखा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी ।।........
दादुर भी झूमि-झूमि करे लागल सोर। बनवां में मगन होके नाचे लागल मोर ।।
रहिया 'अधीर' देखे सजनी सुकुमारी, बरखा के रीतु लागे रीतुअन से न्यारी ।।..........
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खिल उठे मनवा उदास
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