Village Life
शहरिया में मनवां ना लागे
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
बहुत याद आवे गाँव के डगरिया, शहरिया में मनवां ना लागे।
आपन हमके बोलावेला डेहरिया, शहरिया में मनवां ना लागे ।।
हमके बोलावेला खेत खरिहनवां। चना, गेहूं, धान, मकइया के दनवां ।।
फलिया बाजे छम-छम अरहरिया, शहरिया में मनवां ना लागे ।।......
दूध भात खइनी हम जवनी अंगनवां बचपन के सब सुख भइल सपनवां ।।
नाव कगजा चलवनी पोखरिया, शहरिया में मनवां ना लागे ।।..........
बाबू कहि-कहि के अजिया पुकारें। अँचरा की छंहिया में मइया दुलारें ।।
बीते खेलिये में दिन-दुपहरिया, शहरिया में मनवां ना लागे ।।.........
जनम जनम से बा गउवां से नाता। गउवां के सुख नाहीं इहवां देखावा ।।
जहाँ भरल बा अन्न से बखरिया, शहरिया में मनवा ना लागे ।।.........
Related
More from Village Life
सुधार नइखे
हमरी गउवां में तनिको सुधार नइखे । भाई-भाई में लड़ाई होला प्यार नइखे ।। पहिले के लोग सब एक में रहत रहे। मनवा के बाति सभे सबसे कहत रहे ।।
खिल उठे मनवा उदास
चढ़ते असढ़वा बरसे बदरवा, कि धरती के बूझेला पियासि । बड़ा नीक लागे हरियर दुबिया, खिलि उठे मनवा उदास ।।.......
शहरिया से गाँव हो
दुअरा पर निमिया के घन बाटे छाँव हो। बड़ा नीक लागेला शहरिया से गाँव हो ।। मंगरू भगत लागें गाँव भर के काका। बचनू कँहार लागें बुढ़वन के दादा ।।