Reflections
बेटी रखिहऽ पगडिया के मान
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
'अँखिया के हऊ बेटी हमरी पुतरिया, कि जिनगी के जइसे परान।
बेटी रखिहऽ पगड़िया के मान ।।.......
जब तू जइहऽ बेटी सासुजी की घरवा। जगमग दिअवा जरइहऽ चउबरवा ।।
अपनी ससुर जी में हमरा के देखिऽ, करिहऽ सदा सम्मान। हो.........
घरवा की लोगवा से पहिले तू जगिहऽ। सासु ससुर जी के पाँव तूहू लगिहऽ ।।
जेठ जी के देखिके घूंघट काढ़ि लीहऽ, जइसे बदरवा में चान ।। हो बेटी.........
हमरो बचनिया के गाँठि बान्हि लीह। केहूके जवाब कबहू जनि दीह ।।
अपनी सेनुरवा के ध्यान तू रखिह ओही पर लुटइह परान ।। हो बेटी.......
अँखिया से जनि तू लोर टपकाव। जीवन के सुन्दर सपना सजाव ।।
झर-झर मोतिया गिराव जनि दुअरा, होखेला ओहू के अपमान ।। हो बेटी..........
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